Friday, 27 January 2012

क्षितिज: एक चाह


विचारहीन मन से धरा पर अपने को सम्हाले जरा दूर सामने उस परिवेश को निहारिये जहाँ धरती , जिस पर हमारा अस्तित्व टिका है; और आकाश, जहा पहुँचने की चाह इंसान को चाँद के भी उस पार लेकर चली गयी, दोनों मिलते प्रतीत होते हैं; यही क्षितिज है....
एक ऐसा आभासी परिवेश जिसका असल में कोई अस्तित्व नहीं है, क्षितिज है. संपूर्ण धरा के किसी भी क्षेत्र के छोटे से भाग में खड़े होकर क्षितिज को निहारें तो लगता है की बस कुछ कदमो की दूरी है और फिर समूचे क्षितिज के आगोश में पहुँच जाना है, पर जैसे-जैसे उस क्षितिज का वास्तविक अस्तित्व(जो वास्तव में नहीं होता है, पर मानव मन में बसा है) पाने के लिए हम आगे बढ़ते जाते हैं, वो हमसे दूर ही होता जाता है.
भावावेश में उसे पाने क लिए हमारे कदमो की तेजी में भी धार आती है. द्रुतगामी वेग से हमारी चाह और हमारे कदम, जिन्होंने कभी डिगना नही सीखा है, आगे बढ़ते रहते हैं. समस्या फिर वही रहती है- वो हमसे अभी भी दूर है. एक समय ऐसा आता है जब हमारा धैर्य,हमारे कदमो की शक्ति और भावनाओं की प्रबलता एक साथ जवाब दे जाते हैं. हम झुककर शारीरिक पीड़ा को कम करने का प्रयास करते हैं. हाथ कमर पर आकर टिक जाते हैं. सर झुक कर हार स्वीकार करता है, और इसी झुके हुए शरीर  के दम पर सर को उठाकर सामने देखते हैं तो उफ़! अभी भी इतना दूर.
थका हुआ शरीर, हारा हुआ मन और जवाब दे चुकी प्रबलता को अंततः यह आभास होता है की क्षितिज का तो कोई अस्तित्व ही नही. मुझे पहले यह ध्यान क्यों नही गया? क्या यह बात मैं जानता नहीं था?, या फिर भावावेश इतने मजबूत थे की वो सच्चाई नहीं स्वीकारते और परिभासायें बदलने में विश्वास रखते हैं, या फिर हारकर सीखने का मजा ही कुछ और है..
असल ज़िन्दगी में भी हम सब के लिए क्षितिज के यही मायने होते हैं. अपने अलग अलग मायने. भ्रामक तथ्य है की क्षितिज और शिखर एक से पैमाने हैं. शिखर आशयित है उस मानक से जहाँ पर हम पहुंचना चाहते हैं. हम अपनी प्रतिभा, ज़ज्बे और जूनून के दम पर अपने लिए शिखर का आकलन करते हैं पर उस शिखर पर पहुंचकर भी हमारी इच्छाएं "और" बलवती हो जाती हैं . इसी "और" की चाह हमारा शिखर फिर से निर्धारित करती हैं. यही और हमारी असल ज़िन्दगी का क्षितिज है.
अमेरिकी संस्था के एक सर्वेक्षण में 93 प्रतिशत लोगों के अन्दर अपने को और ऊँचा उठाने की चाह पायी गयी. जिन 7 प्रतिशत लोगों ने अपने को अपने स्तर पर सीमित कर लिया, उनमे ज्यादातर ऐसे थे जिन्हें वो पद किसी सम्मानित व्यक्ति से जुड़े रहने की वजह से उपहारस्वरूप मिला था, या फिर उत्तराधिकार में.
शिखर मिलते जाते हैं पर क्षितिज की प्राप्ति कभी नहीं होती.पूरी ज़िन्दगी हम इसे पाने में लगा देते हैं और अंत में यकीन आता है की इसे तो पाया ही नहीं जा सकता. सारी ज़िन्दगी एक चाह बनकर रह जाता है- क्षितिज

सुबह से जो दौड़ शुरु की थी वो जीवन के शुरूआती दिन थे. हौसले बुलंद थे, क़दमों में जान थी. दोपहर भर दौड़ते रहे, जीवन के हर कठिन रास्तों का सामना किया क्षितिज को पाने के लिए, सांझ होते होते शरीर थक कर चूर हो गया, और तब जीवन के अंतिम क्षणों में हमको यकीन आया

                                क्षितिज अभी भी दूर है..........